शिक्षा की 'सफेद लूट' के खिलाफ फारबिसगंज में विद्रोह: ABVP अध्यक्ष सूरज चौधरी का आमरण अनशन शुरू।
ग्राउंड जीरो: किताबों के नाम पर कमीशन और ड्रेस का ड्रामा, क्या बिहार सरकार लेगी इन स्कूलों पर एक्शन?
विशेष रिपोर्ट: शिक्षा या 'सफेद लूट'? फारबिसगंज में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी के खिलाफ 'रणभेरी', ABVP अध्यक्ष सूरज चौधरी आमरण अनशन पर
संवाददाता: टाइम्स भारत न्यूज़ डेस्क स्थान: फारबिसगंज (अररिया) तारीख: 9 अप्रैल, 2026
1. बाबा साहेब का सपना और आज की कड़वी हकीकत
भारत के संविधान शिल्पी डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था— "गरीबों का उत्थान तब होगा, जब मंत्री और संतरी दोनों की किताब एक होगी। दलितों और वंचितों का उदय तब होगा, जब मालिक और मजदूर का बच्चा एक ही छत के नीचे एक जैसी शिक्षा पाएगा।"
लेकिन आजादी के दशकों बाद आज फारबिसगंज की सड़कों पर जो नजारा है, वह बाबा साहेब के सपनों के ठीक विपरीत है। आज शिक्षा 'अधिकार' नहीं, बल्कि 'व्यापार' बन चुकी है। इसी 'सफेद लूट' और प्राइवेट स्कूलों की तानाशाही के खिलाफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) फारबिसगंज कॉलेज के अध्यक्ष सूरज चौधरी आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। उनका यह अनशन मध्यम और निम्न वर्ग के उन हजारों माता-पिताओं की चीख है, जो अपने बच्चों के भविष्य की खातिर निजी स्कूलों की चौखट पर हर साल 'आर्थिक रूप से लूटे' जा रहे हैं।
2. फीस का मायाजाल: एडमिशन के नाम पर 'मोटा माल'

अगर आज हम फारबिसगंज और आसपास के प्राइवेट स्कूलों के फीस स्ट्रक्चर पर नजर डालें, तो आंकड़े डराने वाले हैं।
- एडमिशन की 'एंट्री फीस': एक कक्षा 2 (Class 2) के बच्चे का एडमिशन कराने के लिए अभिभावकों को ₹10,000 से ₹15,000 तक केवल 'एडमिशन फीस' के नाम पर देने पड़ रहे हैं।
- किताबों का 'भारी' बोझ: प्राइवेट पब्लिकेशन के साथ सांठगांठ कर स्कूल ऐसी किताबें थोप रहे हैं, जिनकी कीमत ₹8,000 से ₹10,000 तक जा रही है।
- ड्रेस कोड का ड्रामा: स्कूलों में अब एक नहीं, बल्कि तीन तरह के ड्रेस अनिवार्य कर दिए गए हैं—रेगुलर यूनिफॉर्म, पीटी यूनिफॉर्म और हाउस यूनिफॉर्म। मजे की बात यह है कि ये सब स्कूल द्वारा निर्धारित चुनिंदा दुकानों पर ही मिलते हैं।
3. ₹20,000 कमाने वाला पिता क्या करे?
टाइम्स भारत न्यूज़ एक सीधा सवाल उठाता है— क्या ₹20,000 मासिक वेतन भोगी कोई प्राइवेट कर्मचारी अपने दो बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ा सकता है? गणित समझिए:
- दो बच्चों की फीस + बस का किराया: ₹6,000
- सालाना किताबों और ड्रेस का खर्च (औसत मासिक): ₹2,500
- अन्य स्कूल गतिविधियां: ₹1,000 कुल खर्च: ₹9,500 प्रति माह (केवल शिक्षा पर)। आधे से अधिक वेतन केवल बच्चों की स्कूल की जरूरतों में चला जाता है। ऐसे में किराया, राशन और चिकित्सा के लिए क्या बचेगा? आज की परिस्थिति में एक आम आदमी के लिए अपने बच्चों को 'अच्छी' प्राइवेट शिक्षा दिलाना असंभव सा प्रतीत हो रहा है।
4. सरकारी तंत्र की विफलता और निजीकरण का 'फ्री हैंड'
एक तरफ सरकार स्कूलों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि सरकारी स्कूल आज तक वह 'विश्वसनीयता' (Trust) पैदा नहीं कर पाए हैं जो प्राइवेट स्कूलों ने मार्केटिंग के जरिए बना ली है। हर मां-बाप चाहता है कि उसका बच्चा टाई लगाकर इंग्लिश मीडियम में पढ़े, और इसी 'महत्वाकांक्षा' का फायदा ये प्राइवेट स्कूल उठा रहे हैं।
सरकारी नियम कहाँ हैं? क्या भारतीय शिक्षा पद्धति में इन स्कूलों पर लगाम लगाने के लिए कोई प्रभावी 'रूल्स और रेगुलेशन' हैं? हर साल फीस में 7% से 10% की अनिवार्य वृद्धि कर दी जाती है, जिसे रोकने वाला कोई नहीं है। 'शिक्षा का अधिकार' (RTE) के नियम केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं।
5. अनशन को मिलता जन-समर्थन: सरकार को चुनौती
सूरज चौधरी के इस साहसी कदम को स्थानीय समाजसेवियों और अभिभावकों का भारी नैतिक समर्थन मिल रहा है। इस अनशन स्थल पर पहुंचे भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश स्तरीय कार्यकर्ता प्रवीण कुमार ने कड़े शब्दों में कहा कि बिहार सरकार को इस लूट का तुरंत संज्ञान लेना होगा।
समाजसेवियों का कहना है कि अगर जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग ने इन स्कूलों की ऑडिटिंग नहीं की और फीस वृद्धि पर रोक नहीं लगाई, तो यह आंदोलन केवल फारबिसगंज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे बिहार में फैलेगा।
6. निष्कर्ष: मुकाम या सिर्फ आश्वासन?
सवाल अब भी वही है— क्या सूरज चौधरी का यह त्याग कोई ठोस परिणाम ला पाएगा? क्या जिला प्रशासन इन 'शिक्षा माफियाओं' के खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत दिखाएगा? या फिर हर बार की तरह एक 'कमेटी' बनाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
टाइम्स भारत न्यूज़ इस मुद्दे पर तब तक नजर बनाए रखेगा जब तक फारबिसगंज के हर मध्यमवर्गीय परिवार को इस आर्थिक शोषण से मुक्ति नहीं मिल जाती।
लेखक: जय दुबे
एडिटर टाइम्स भारत न्यूज़
बीकॉम दिल्ली यूनिवर्सिटी
11 वर्ष पत्रकारिता अनुभव