विशेष रिपोर्ट: 1952 में गोरखपुर से शुरू हुआ सफर, आज बना दुनिया का सबसे बड़ा शिक्षा नेटवर्क—जानिए सरस्वती शिशु मंदिर का इतिहास।

Edited By: Jay Dubey
Updated At: 07 April 2026 15:28:41

हवन-पूजन के साथ 'श्री रानी सरस्वती विद्या मंदिर' में नए सत्र का श्रीगणेश, वैदिक मंत्रों से गूंजा फारबिसगंज।

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विशेष रिपोर्ट: हवन-पूजन और वैदिक मंत्रों के साथ 'श्री रानी सरस्वती विद्या मंदिर' में नए सत्र का आगाज—जानिए 1952 से अब तक का गौरवशाली इतिहास

संवाददाता: टाइम्स भारत न्यूज़ डेस्क स्थान: फारबिसगंज (अररिया) तारीख: 7 अप्रैल, 2026

1. नवीन सत्र का भव्य शुभारंभ: आध्यात्मिक ऊर्जा से गूंजा परिसर

सीमांचल की प्रमुख शैक्षणिक संस्था श्री रानी सरस्वती विद्या मंदिर, फारबिसगंज में सोमवार को नवीन शैक्षणिक सत्र 2026-27 का शुभारंभ अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ किया गया। विद्यालय की परंपरा के अनुसार, नए सत्र की शुरुआत केवल कक्षाओं से नहीं, बल्कि हवन-पूजन और वैदिक मंत्रोच्चारण से हुई।

पूरा विद्यालय परिसर आहुतियों की सुगंध और मंत्रों की ध्वनि से आध्यात्मिक वातावरण में डूब गया। इस अवसर पर विद्यालय परिवार ने नए और पुराने भैया-बहनों का तिलक लगाकर आत्मीय स्वागत किया। प्रधानाचार्य आशुतोष कुमार मिश्र ने बताया कि हवन-पूजन से विद्यार्थियों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वे एकाग्रता के साथ अपनी शिक्षा की नई यात्रा शुरू करते हैं।

2. सरस्वती शिशु मंदिर का इतिहास: एक कमरे से 'विश्व के सबसे बड़े' नेटवर्क तक

आज जब हम फारबिसगंज में इस भव्य आयोजन को देख रहे हैं, तो इसके पीछे सात दशकों का कठिन तप और समर्पण छिपा है। सरस्वती शिशु मंदिर का इतिहास भारतीय शिक्षा जगत में एक क्रांतिकारी अध्याय है।

  • 1952: पहली दीपशिखा (गोरखपुर): सरस्वती शिशु मंदिर की नींव 1952 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में रखी गई थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारकों— नानाजी देशमुख, भाऊराव देवरस और कृष्ण चंद्र गांधी की प्रेरणा से मात्र 5 रुपये के मासिक किराए के एक कमरे में पहला विद्यालय शुरू हुआ था।
  • नामकरण का आधार: विद्यालय का नाम 'सरस्वती' (विद्या की देवी) और 'शिशु मंदिर' (जहाँ बच्चों को देवता मानकर पूजा जाए) रखा गया। इसका उद्देश्य लॉर्ड मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का एक भारतीय और सांस्कृतिक विकल्प तैयार करना था।
  • 1977: विद्या भारती का गठन: जैसे-जैसे इन विद्यालयों की संख्या बढ़ी, इनके समन्वय के लिए 1977 में 'विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान' का गठन किया गया, जिसका मुख्यालय दिल्ली और पंजीकृत कार्यालय लखनऊ में है।

3. शिक्षा पद्धति: पंचपदी और संस्कार आधारित अधिगम

विद्या भारती के विद्यालयों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी विशिष्ट शिक्षण पद्धति है। यहाँ केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि 'पंचपदी' (अधिगम के पांच चरण: अदिति, बोध, अभ्यास, प्रयोग और प्रसार) पर जोर दिया जाता है।

  • शारीरिक और मानसिक विकास: योग, संगीत, संस्कृत और नैतिक शिक्षा यहाँ के अनिवार्य विषय हैं।
  • गुरु-शिष्य परंपरा: यहाँ शिक्षकों को 'आचार्य' और छात्रों को 'भैया-बहन' कहा जाता है, जो भारतीय परिवार भाव को दर्शाता है।

4. वर्तमान विस्तार: शिक्षा का विशाल वटवृक्ष

गोरखपुर के उस छोटे से कमरे से शुरू हुआ यह सफर आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है।

  • वर्तमान में पूरे भारत में विद्या भारती के अंतर्गत 30,000 से अधिक विद्यालय संचालित हैं।
  • लगभग 35 लाख विद्यार्थी इन संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
  • 1.5 लाख से अधिक आचार्य राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में समर्पित हैं। यही कारण है कि विद्या भारती को दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी (Non-Governmental) शैक्षणिक संगठन माना जाता है।

5. फारबिसगंज में 'श्री रानी सरस्वती विद्या मंदिर' का योगदान

अररिया जिले के फारबिसगंज में श्री रानी सरस्वती विद्या मंदिर पिछले कई वर्षों से शिक्षा और संस्कारों का केंद्र बना हुआ है। शिशु मंदिर खंड के प्रधानाचार्य रामनरेेश सिंह के मार्गदर्शन में यहाँ के विद्यार्थी न केवल अकादमिक रूप से अव्वल आते हैं, बल्कि खेलकूद और सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में भी जिले और राज्य का नाम रोशन करते हैं।

6. निष्कर्ष: आधुनिकता और परंपरा का संगम

आज जब दुनिया तकनीक की ओर भाग रही है, सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संस्थान नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप आधुनिक विज्ञान और प्राचीन वैदिक संस्कारों का अद्भुत मेल प्रस्तुत कर रहे हैं। फारबिसगंज में सोमवार को हुआ यह आयोजन इसी परंपरा की एक अटूट कड़ी है।

जय दुबे
एडिटर टाइम्स भारत न्यूज़

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