मिडिल ईस्ट संकट: खामेनेई की मृत्यु के बाद क्या भारत में महंगा होगा पेट्रोल-डीजल और LPG? जानें पूरा गणित।

Edited By: Jay Dubey
Updated At: 01 March 2026 22:46:39

सावधान! युद्ध की आहट से आपकी रसोई और गाड़ी की जेब पर पड़ेगा भारी असर, सरकार ने बुलाई इमरजेंसी मीटिंग।

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मिडिल ईस्ट में तनाव: खामेनेई की मृत्यु के बाद क्या भारत में महंगे होंगे पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस? जानें एक्सपोर्ट पर असर

नई दिल्ली: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु और उसके बाद अमेरिका-इजरायल के सैन्य हमलों ने मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) को युद्ध की कगार पर खड़ा कर दिया है। इस तनाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से वैश्विक व्यापार बाधित हो सकता है, जिससे माल ढुलाई (freight) और बीमा की लागत बढ़ेगी और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है।

वाणिज्य मंत्रालय की आपात बैठक कल

बदलते हालातों को देखते हुए भारत सरकार का वाणिज्य मंत्रालय एक्शन मोड में आ गया है। सोमवार को मंत्रालय ने निर्यातकों, शिपिंग कंपनियों और माल ढुलाई एजेंटों के साथ एक अहम बैठक बुलाई है। इस बैठक में इस बात का आकलन किया जाएगा कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और बाब अल-मंडेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर तनाव का भारत के व्यापार पर क्या असर होगा।

भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार:

  • कच्चा तेल और गैस: भारत अपनी जरूरत का लगभग 35-50% कच्चा तेल और भारी मात्रा में एलएनजी (LNG) इन्हीं समुद्री रास्तों से मंगवाता है। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होता है, तो सप्लाई चेन पूरी तरह टूट सकती है।
  • महंगाई का खतरा: ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। इससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा और देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे महंगाई बढ़ना तय है।
  • LPG की किल्लत: भारत अपनी जरूरत का 80-85% एलपीजी खाड़ी देशों से आयात करता है। कच्चे तेल के पास तो फिर भी रणनीतिक भंडार (Strategic Reserves) हैं, लेकिन एलपीजी के लिए ऐसी कोई बड़ी व्यवस्था नहीं है, जिससे रसोई गैस की सप्लाई पर सीधा संकट आ सकता है।

निर्यात और बासमती चावल पर संकट

खाड़ी देश भारतीय निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से बासमती चावल का करीब आधा निर्यात सऊदी अरब, ईरान, इराक और यूएई जैसे देशों को होता है।

  • शिपिंग रूट में बदलाव: यदि युद्ध की स्थिति बनती है, तो जहाजों को 'केप ऑफ गुड होप' के रास्ते लंबा चक्कर काटकर जाना होगा। इससे सामान पहुँचने में 15 से 20 दिन की देरी होगी और माल ढुलाई का खर्च भी काफी बढ़ जाएगा।
  • निर्यातकों को सलाह: इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन ने अपने सदस्यों को सलाह दी है कि वे फिलहाल ईरान और खाड़ी देशों के लिए नए सौदे (CIF आधार पर) करने से बचें, क्योंकि भविष्य में ढुलाई और बीमा की कीमतें अनियंत्रित हो सकती हैं।

क्या है विकल्प?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर खाड़ी देशों से सप्लाई रुकती है, तो भारत रूस, अमेरिका और लैटिन अमेरिका से तेल की खरीदारी बढ़ा सकता है। हालांकि, यह विकल्प भी महंगा और समय लेने वाला साबित होगा। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें ईरान और इजरायल के अगले कदम पर टिकी हैं।

टाइम्स भारत न्यूज़ डेस्क

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