बांग्लादेश मे दीपचंद दास का अंत।
जाए तो जाए कहां
Jay Dubey, [20-12-2025 15:44]
आपके घर के आगे 2000 की भीड़ जब आपके घर से खींच के बाहर निकले जहां कोई सरकार और प्रशासन तंत्र कान मे तेल डालकर सोया हुआ हो। कल्पना कीजिए क्या होगा?
दीपचंद दास बांग्लादेश में इसी तरह से 2000 की भीड़ खींचकर निकाल और पिट पिट कर पेड़ से लटका कर केरोसिन डालकर आग लगा दिया गया।जब प्रशासन ने दीपचंद दास को अपने कब्जे में लिया और भीड़ को सौंप दिया था। और उसके बाद जब प्रशासन ने उसकी मृत बॉडी लेने की कोशिश की तो प्रशासन को भी बॉडी नहीं दिया गया। कहा जाता है कि ईस निंदा का आरोप उसके ऊपर था । जिसे किसी ने पुष्टि नही की बस दो लोगो ने कहा और मानवता को बलि दे दिया गया। विश्व मानवता संगठन, यूरोपीय संघ, विश्व सुरक्षा परिषद, ह्यूमन राइट की दुहाई देने वाले अमेरिका, भारतीय बुद्धिजीवी, बॉलीवुड के सो कॉल्ड सेकुलर किसी ने कुछ नहीं कहा।
अब प्रश्न सोचने वाली यह है कि यह क्या है किसकी मानसिकता है कौन सा अपराध है या फिर राजनीति से धार्मिक उन्माद का परिचायक।
बांग्लादेश में हिंदू की संख्या आज एक कड़ोड़ तीन लाख है।। कहीं तो कुछ जरूर है जो आने वाले दिनों की संकेत दे रहा है।
धर्म के नाम पर हिंसा क्या सभय समाज का परिचय बन चुका है या यूं कहें कि हिंसा ही आज शक्ति का दूसरा रूप जिसके सामने सभी नतमस्तक है।
देश के सभी बुद्धिजीवी जो अपने आप को बड़ी-बड़ी पार्टियों में बड़े-बड़े फिल्मों के बैनर के तले निर्देशन कर समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं क्या उनका आईना फूट चुका है अब उन्हें कुछ नहीं दिखता।
यह घटना बांग्लादेश की जरूर है लेकिन कभी बांग्लादेश भारत का ही अंग था और वहां के रहने वाले हिंदू जिनके लिए भारत ही एक ऐसा देश है जहां वह सरल ले पाएंगे और अपनी धार्मिक मान्यता और आस्थाओं को पूरा कर पाएंगे परंतु व्यवस्थाओं का चोट ग्लोबलाइजेशन का मोड के साथ जिंदगी के जादोजहद के बीच से सिसखिया लेती हुई दीपचंद दास का अंत।