अमेरिका–भारत के बीच टैरिफ और व्यापार समझौते की नई दिशा
झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का मास्टर स्ट्रोक
अमेरिका–भारत के बीच टैरिफ और व्यापार समझौते की नई दिशा
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। दोनों देशों के बीच टैरिफ (शुल्क) और व्यापार समझौते को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही है, जिसका उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार को अधिक संतुलित और पारदर्शी बनाना है। दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं के बीच यह समझौता न केवल आर्थिक, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर कुछ क्षेत्रों में आयात शुल्क बढ़ाया था, जबकि भारत ने भी अमेरिकी कृषि उत्पादों और औद्योगिक वस्तुओं पर टैरिफ लगाया। इससे दोनों देशों के निर्यातकों को नुकसान हुआ और व्यापारिक तनाव बढ़ा। अब नई पहल के तहत इन टैरिफ विवादों को सुलझाने और आपसी व्यापार को आसान बनाने की कोशिश की जा रही है।
प्रस्तावित व्यापार समझौते में आईटी सेवाओं, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, स्टील और कृषि जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। भारत चाहता है कि उसके श्रम-प्रधान उद्योगों को अमेरिकी बाज़ार में बेहतर पहुँच मिले, वहीं अमेरिका डिजिटल व्यापार, बौद्धिक संपदा अधिकार और बाज़ार खोलने जैसे मुद्दों पर ज़ोर दे रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह व्यापार समझौता सफल होता है, तो इससे दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा कम हो सकता है और निवेश के नए अवसर पैदा होंगे। भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाज़ार में प्रतिस्पर्धा का लाभ मिलेगा, जबकि अमेरिकी कंपनियों को भारत जैसे बड़े उपभोक्ता बाज़ार तक आसान पहुँच मिल सकेगी।
हालांकि, यह रास्ता पूरी तरह आसान नहीं है। घरेलू उद्योगों की सुरक्षा, किसानों के हित और रणनीतिक स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर भारत को संतुलन बनाना होगा। वहीं अमेरिका के सामने भी अपने व्यापारिक हितों और साझेदारी के बीच सामंजस्य की चुनौती है।
कुल मिलाकर, अमेरिका–भारत के बीच टैरिफ और व्यापार समझौता केवल आर्थिक करार नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में दोनों देशों की साझेदारी को नई मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।